किसने दस्तक दी ....ये दिल पर ...कौन है ??
आप तो अन्दर है , यह बाहर कौन है ??
राज़ जो कुछ हो इशारों में बता भी देना ,
हाथ जब उससे मिलाना तो दबा भी देना ।
कभी दिमाग , कभी दिल , कभी नज़र में रहो ,
यह सब तुम्हारे ही घर है किसी भी घर में रहो .
जुबां तो खोल , नज़र तो मिला , जवाब तो दे ,
मैं कितनी बार लुटा मुझे हिसाब तो दे .
और तेरे बदन की लिखावट में हैं उतार चढ़ाव ,
मैं तुझको कैसे पढूंगा मुझे किताब तो दे .
रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पढता है ,
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पढता है .
उसकी याद आई है....सांसों ! ज़रा आहिस्ता चलो
धडकनों से भी इबादत में खलल पढता है .
समन्दरो के सफ़र में हवा चलाता है ,
जहाज़ खुद नहीं चलते , खुदा चलाता है .
और तुझे खबर नहीं मेले में घुमने वाले
तेरी दूकान कोई दूसरा चलाता है
और यह लोग पाँव नहीं ज़हन से अपाहिज हैं ,
उधर चलेंगे जहाँ रहनुमा चलाता है ..
और हम अपने बूढ़े चरागों पे खूब इतराए
और उसको भूल गए जो हवा चलाता है ...
ये हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था ,
मैं बच भी जाता तो एक रोज़ मरने वाला था ..
बुलंदियों का नशा टूट कर बिखरने लगा ,
मेरा जहाज़ ज़मीन पर उतरने वाला था ...
मेरा नसीब मेरे हाथ कट गए वरना,
मैं तेरी मांग मैं सिन्दूर भरने वाला था ..
ज़मीन से अबके बड़े फासले उगे वरना ,
वो भी मुझसे बड़ा प्यार करने वाला था ..
मेरे चराग मेरी शब् मेरी मुंडेरे हैं ,
मैं कब शारीर हवाओं से डरने वाला था ..
तुफानो से आँख मिलो ,सैलाबों पर वार करो ,
मल्लाहो का चक्कर छोड़ो ,तैर के दरिया पर करो .!
फूलो की दुकाने खोलो खुशबु का व्योपार करो
इश्क खता हे तो ये खता एक बार नहीं सौ बार करो
उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो
ज़िन्दगी क्या है खुद ही समझ जाओगे
बारिशों में पतंगे उड़ाया करो
दोस्तों से मुलाक़ात के नाम पर
नीम की पत्तियां चबाया करो
शाम के बाद तुम जब सेहर देख लो
कुछ फकीरों को खाना खिलाया करो
अपने सीने में दो गश ज़मीन बांध कर
आसमानों का ज़र्फ़ अजमाया करो
चाँद सूरज कहाँ अपनी मंजिल कहाँ
ऐसे वैसों को मुह मत लगाया कर
घर उसी का सही तुम भी हकदार हो
रोज आया करो, रोज जाया करो ..
उसकी कथ्थेई आँखों में हैं जंतर मंतर सब
चाकू -वाकू, छुरियां-वुरियाँ, खंजर -वंजर सब
जब से तुम हो रूठी मुझ से रोठी रोठी हैं
चादर-वादर, तकिया-वाकिया, बिस्तर -विस्तर सब
मुझ से बिछ्ड कर वो भी कहाँ अब पहले जैसी है
फीके पड़ गए कपरे -वपड़े, जेवर-वेवर सब
आखिर मैं किस दिन डूबूँगा ,फिकरे करते हैं
दरिया-वरिया,कश्ती-वश्ती,लंगर-वंगर सब
इश्क विश्क के सारे नुश्खे मुझसे सिखने आते हे
जोहर-वोहर,ताहिर-वहिर,मंज़र-वंजार सब
जाके कहदे कोई शोलों से, चिंगारी से
फूल इस बार खिले है बड़ी तयारी से
बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए
हमने किरात भी मांगी है तो खुद्दारी से
बीमार को मर्ज़ की दावा देनी चाहिए
मै पीना चाहता हों पिला देनी चाहिए
अल्लाह बरकतों से नवाजेगा इश्क में
है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए.
में ताज हूँ तो ताज को सर पर सजाये लोग
में ख़ाक हूँ तो ख़ाक उदा देनी चाहिए
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