बहुत सोचा, बहुत विचार किया, दिमागी दौड़ करवा के देख ली... पर ऐसा लगता है की शायदइस कविता को या यू कहूं कि मेरे प्रयास के लिये इससे अच्छा शीर्षक फिलहाल मुझे सूझ नही रहा है| सच कहूं तो लिखने की कोशिश तो एक लम्बे समय से हो रही है... दिन महीने बन गए और महीने साल पर पन्ने फटते गये, पंक्तिया मिटती गयी और अपनी कोशिश रही बेमिसाल|बेमिसाल इसलिए क्यूंकि इतने कुछ के बाद भी जब देखता तो समझ आता की नतीजा तो वो ही है सिफ़र | तब ऐसा भी लगने लगा की शायद लिखना मेरे लिए उतना ही कठिन है जितना सरल की गाना।
In short n sweet, बहुत कोशिश के बाद भी कुछ ख़ास नहीं लिख पा रहा था, पर जैसा कहते है की शायद समय, परिस्तिथि और उम्र आपको सब सिखा देती है । After all experience counts n yes even came to know that without any source of inspiration it’s really difficult to write something. इस बार कोशिश की है पढिये और अपनी प्रतिक्रिया भी ज़रूर दीजिये |
जितना सोचा उतना अंसा नहीं था ये, कुछ जाना बड़ा अनजाना सा ये
कुछ खोया बहुत पाया सा ये, कुछ लम्हों में जीवन बिताया सा ये ।
हर सुबह होगा तेरी मुस्कुराहट का दीदार, यह सोच के रात का हर पल बिताया सा ये ।
उन जुल्फों का तेरे गालों पे आना, फिर उन नाज़ुक उंगलिओं से तेरा उन्हें हटाना
उस एक पल में जैसे सारा संसार भुलाया सा ये ।
कुछ खोया कुछ पाया सा ये, उन लम्हों में जीवन बिताया सा ये ।
कसमे हो तो तोड़ भी दूं , तूफाँ हो तो मोड़ भी दूं
चाहत हो तो छोड़ भी दूं , पर इस आदत के आगे अब मै क्या करूँ ??
बहुत खुद तो समझाया, मनाया, बुझाया सा ये ।
कुछ खोया कुछ पाया सा ये, उन लम्हों में सारा जीवन पाया सा ये ।
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